एक गाँव में एक मुर्गा रहता था। वह रोज भोर में उठता था और सबसे पहले जोर-जोर से बाँग देता था। फिर नित्य-क्रिया के बाद सैर को निकल पड़ता था। धीरे-धीरे सुबह हो जाती और सारे गाँव वाले भी उठ के अपने-अपने काम में लग जाते।
ये सिलसिला चलता रहा। फिर उस मुर्गे की धूमधाम से शादी हुई, बीवी घर आय़ी। सबकुछ अच्छे से चलता रहा पहले की तरह। लेकिन मुर्गे की बीवी को धीरे-धीरे ये लगने लगा कि मेरे पति उठकर बाँग देते है, तभी सबेरा होता है और लोग काम पर जाते है। जिससे लोगो का जीवन-यापन होता है। वह आस-पड़ोस में इसका जिक्र भी करती और धौंस भी जमाती। उसको इस बात घमडं भी रहने लगा। एक बार पड़ोसियों से उसकी किसी बात को लेकर लड़ाई हो गयी। फिर क्या था बीवी ने मुर्गे को सारी बाते बतायी, और बाँग देने तथा घर से निकलने से मना कर दिया। मुर्गे को भी बीवी की बातों में सच्चाई लगी और वह झासें में आ गया। मुर्गे ने भोर में उठकर बाँग देना छोड़ दिया, सैर को जाना भी छोड़ दिया। दिनभर घर में ही पडा़ रहता। धीरे-धीरे उसकी सेहत बिगड़ने लगी और वह बुरी तरह बीमार हो गया।
जब मुर्गे की बीमारी पड़ोसियो से देखी नही गयी तो वे उसे हकीम के पास ले गये। हकीम को सारी बाते समझते देर नही लगी। उसने मुर्गे को बैठाकर सारी बाते समझायी, कि न तुम्हारे बाँग देने से दिन होता है और न ही तुम्हारे बिना ये दुनिया रूक जाएगी। ये प्रकृति का नियम है। बीवी के बहकावे में आकर और भ्रम, ईर्ष्या के जाल में फंसकर तुमने अपना ही नुकसान किया, अपनी आदते खराब कर ली और सेहत भी बिगाड़ ली।
अगर संयोग से ये सही भी होता कि तुम्हारे बाँग देने से दिन होता तब भी तुम्हे घमंड नही करना चाहिए था। हम सभी एक-दूसरे से किसी न किसी तरह जुड़े है और एक-दूसरे के पूरक है। मुर्गे और उसकी बीवी को अपनी गलती का एहसास हुआ। घर लौटकर दोनो रात में सो गये, फिर भोर में उठकर मुर्गे ने बाँग दिया और एक नई सुबह का स्वागत किया।
Monday, October 24, 2011
Thursday, April 1, 2010
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